कोन-(मुन्ना लाल जायसवाल)
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कोन(सोनभद्र)।उड़ीसा के कालाहांडी के तरह ही सोनभद्र के तरिया क्षेत्र रानीडीह,चन्नी,पिण्डारी पहाड़ी इलाका में आज भी यहां के आदिवासी बनवासी रहवासी मूलभूत समस्या से वंचित है।चकरिया,बसुहारी, आदि दर्जनों गांव के अलावा क्षेत्र के ग्रामीणों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। एक ओर जहां सरकार हर घर नल जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के माध्यम से प्रत्येक घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने का दावा कर रही है, वहीं रानीडीह के ग्रामीण आज भी कई सालों से सोन नदी का दूषित पानी पीने को मजबूर है। यह स्थिति सरकारी योजनाओं की हकीकत और स्थानीय प्रशासन की घोर लापरवाही को उजागर करती है। ग्राम प्रधान प्रतिनिधि विदेश कुमार का कहना है कि उनके गांव में हर घर नल की टोटी तो लगभग 15 महीने पहले ही लग चुकी है, लेकिन आज तक उस टोटी में पानी नहीं आया है। सरकार की यह योजना उनके लिए मात्र एक दिखावा बनकर रह गई है।
स्थानीय लोग बताते है कि जिस पानी के नल से वे पहले पानी पीते थे, उसकी स्थिति भी अब दयनीय है और मजबूरी वश उन्हें आज भी सोन नदी का गंदा पानी पीकर जीवन बिताना पड़ रहा है। नाले का दूषित पानी पीने के कारण ग्रामीण कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे है। दूषित जल से होने वाली बीमारियां जैसे डायरिया, पेट संबंधी संक्रमण और अन्य जल-जनित रोगों ने गांव में अपनी पकड़ बना ली है, लेकिन इस पर किसी का ध्यान नहीं है। ग्रामीण सवाल उठाते है, इसका जिम्मेदार कौन है।
पेयजल के लिए आज भी दर-दर भटकते हैं ग्रामीण,
ग्रामीणों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए दर-दर भटकना पड़ता है और वे लगातार ठोकरें खाते रहते है। ग्रामीण मायूस होकर पूछते है, कब आएगा टोटी में पानी। कई सालों से पीने के लिए स्वच्छ पानी को तरस रहे है, कब आएगा टोटी में पानी। यह सिर्फ पानी की समस्या नहीं है, बल्कि सोनभद्र के कोन ब्लॉक अंतर्गत तरिया क्षेत्र का यह गांव मूलभूत सुविधाओं से पूरी तरह वंचित है। ग्रामीणों का कहना है कि यहां न तो अच्छी सड़कें है, न रहने के लिए उचित आवास है, न पीने का पानी उपलब्ध है और न ही बिजली की पर्याप्त सुविधा है। ऐसी दयनीय स्थिति में गांव के लोग प्रभु का नाम लेकर जैसे-तैसे अपना जीवन यापन कर रहे है। यह मामला सरकार और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्निचह्न लगाता है। यदि ऐसे ग्रामीण इलाकों में भी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जाती है, तो विकास के दावों का क्या अर्थ रह जाता है। जिला प्रशासन को इस तत्काल संज्ञान में लेना चाहिए।